कांशी राम के विचार
एक बार साहब कांशीराम कुछ साथियों के साथ कहीं पैदल जा रहे थे। चलते हुए साहब की नजर गड्ढे में फसे कुत्ते के चार पिल्लों पर पड़ी। साहब को अचानक फिर क्या लगा कि पीछे मुड़े और गड्ढे में से एक पिल्ले को बाहर निकाल कर चलते बने। साथ में चल रहे साथियों ने पूछा साहब यह आपने क्या किया गड्ढे में तो चार पिल्ले थे, लेकिन निकाला आपने केवल एक ही। ऐसा क्यों?
साहब ने बताया;- बाकी तीन उस गड्ढे में आराम से खेल रहे थे लेकिन वह अकेला निकलने का प्रयास कर रहा था। उसको मेरे सहारे की आवश्यकता पहले थी।
एक साथी ने पूछा फिर साहब बाकी तीनों का क्या होगा?
साहब बोले:- उनमे से अब जो निकलने का प्रयास करेगा उसको मेरे पीछे वाला कोई निकालेगा। ऐसा निरन्तर चलता रहेगा और एक दिन चारों बाहर निकल जाएंगे।
लेकिन साहब आपने ही चारों को बाहर क्यों नही निकाला हमारा प्रश्न यह है ? साहब बोले आओ बैठो पहले तुमको ही समझा देता हूं।
देखो बाकी तीनों का आराम से वहीं पर खेलना यह प्रमाणित करता है कि वो वहाँ सन्तुष्ट थे और जिसको मैंने निकाला वह वहाँ संतुष्ट नही था। जिसको मैंने निकाला अब वह कभी भी उस गड्ढे के आसपास नही जाएगा। इसलिए वह उस गड्ढे में दोबारा नही गिरेगा क्योकि उसके अंदर उस गड्ढे का डर बैठ गया। अब अगर मैं बाकी तीनों को भी निकाल देता तो वो फिर उस गड्ढे में जाकर गिर सकते थे क्योंकि अभी तक उनके अंदर गड्ढे का डर नही बैठा था।
जब बाकी के तीनों खेल कर थक जाएंगे तो देखेंगे कि हमारा चौथा साथी कहाँ गया तो उनमें से एक या दो या तीनों फिर निकलने का प्रयास करेंगे। उस समय मेरे जैसा जो आएगा वह उसको बाहर निकाल देगा। फिर वो भी उस गड्ढे से दूर रहेंगे।
फिर साहब ने मिशनरी अंदाज में समझाया। देखो हमको उन लोगों के चक्कर मे नही पड़ना चाहिए जो गुलाम ही बने रहना चाहते है बल्कि उनको सहारा देकर आगे निकलना चाहिए जो इस गुलामी से निकलने की चाहत रखते हैं। इससे आपका समय भी बचेगा और आपका मनोबल भी नही टूटेगा। इसलिए साथियों हमको घबराना नही है, मनोबल नही टूटने देना है और निरंतर काम करते रहना है। एक दिन बाकी के लोग भी कहेंगे कि हम भी आपके साथ हैं।
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