कौटिल्य और मनु धर्मसूत्रों के अनुयायी थे

 कौटिल्य और मनु वर्णव्यवस्था के मामले में एक ही थैली के चट्टे - बट्टे थे । जो मनु ने लिखा , वही कौटिल्य ने भी लिखा । 


कौटिल्य ने जीवन - निर्वाह के लिए ब्राह्मणों को दान और यज्ञ कराना , क्षत्रियों के लिए रक्षा एवं शस्त्रों का प्रयोग , वैश्यों के लिए कृषि - पशुपालन एवं व्यापार तथा शूद्रों के लिए द्विजों की सेवा आदि करना विशिष्ट कर्तव्य बतलाए हैं । 


कौटिल्य और मनु धर्मसूत्रों के अनुयायी थे । मनु ने तो अपनी पुस्तक का नाम '' मनुस्मृति " देकर प्राचीनता का भ्रम पैदा कर दिए , मगर कौटिल्य ने प्राचीनता के चक्कर में अपनी पुस्तक का नाम ही गड़बड़ कर दिए। 


जिस भाषा में कौटिल्य ने अर्थशास्त्र लिखी है , उसी संस्कृत में  "अर्थ " के 14 अर्थों में कोई भी अर्थ '' राजनीति '' का अर्थ नहीं देता है , जबकि अर्थशास्त्र राजनीति की किताब है ।

मतलब कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र राजनीति की किताब है, मगर अर्थ का मतलब संस्कृत में भी राजनीति नहीं होता है। ऐसे ही यह किताब दो नंबर की लग रही है।


(संदर्भ:- शामशास्त्री : अर्थशास्त्र , पृ. 06/ मनुस्मृति  : 01, 88- 91 )

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